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‘आतंकवाद का कोई मज़हब नहीं होता’ शब्द यूँ ही नहीं आया, ये है इसके पीछे का कॉन्टेक्स्ट

मुस्लिम आतंकवादी चाहे वो इराक में हो या सीरिया में , जब उसके गुनाहों के कारण आप अपने पड़ोस के मुस्लिम को शक से देखने लगे। उसपे देशभक्ति थोपने लगे। निकल जाओ यहाँ से कहने लगे। जब आतंकवादी घटना के बाद उनको गिल्ट महसूस कराई जाने लगी। जब बेकसूरों को जेल में डाला गया। भेदभाव किया गया। ( भारत या दुसरे देशों में )

तब जाके लिबरल्स ने कहना शुरू किया कि आतंकवाद का मज़हब नहीं होता।
यहाँ पे अल्पसंख्यक / बहुसंख्यक होना और इतिहास का कॉन्टेक्स्ट होना महत्त्वपूर्ण है।

भारत के विषय में ये भी कि पाकिस्तान में मुस्लिम रहते है , तो पाकिस्तान की तरफ से आये आतंकवादी मुस्लिम होते है।

जब भी कभी कोई हिन्दू आतंकवादी कुछ करता है तो मुझे मुँह नहीं छिपाना पड़ता। मुझे कोई शक की नज़रों से नहीं देखता। कोई मेरे से आके प्रश्न नहीं करता कि ये हिन्दू क्यों कर रहे हैं।

संघियों के कारनामों का जवाब मुझे देना नहीं पड़ता। गौ गुण्डों के विषय पे मेरे से सवाल नहीं किये जाते।

ये दोनों बातों में अंतर है। हिन्दू आतंकवादी भी इसलिए ही बोला जाता है कि देखिये हिन्दू भी होते है, मुस्लिम एक्सक्लूसिव नहीं हैं। देखिये हिन्दू भी है और मुस्लिम भी, आतंकवाद का कोई मज़हब नहीं होता।

जब हिन्दुओं को जवाब देना पड़ जाए ऐसे हिन्दू आतंकवादियों का तो वहाँ हम कहेंगे आतंकवाद का कोई मज़हब नहीं होता।

– जसवंत की फेसबुक वॉल से साभार

 

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