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तीन तलाक़ : औरतों के नाम पर ढिंढोरा शरीयत में दखलंदाजी की कोशिश

औरतों के नाम पर जिस तरह ढिंढोरा पीट कर जिस तरह से शरीयत में दखलंदाजी की कोशिश हो रही है, वह निंदनीय है। तीन तलाक को लेकर जिस तरह सरकार ने विधेयक तैयार किया है उससे साफ़ ज़ाहिर है कि आखिर किस ने उसको यह मौका प्रदान किया है। एक बार में तीन तलाक को गैरकानूनी करार दिया गया है।

समें तलाक़ देने वाले पति को तीन साल कैद की सजा का प्रावधान भी है। एक समय था जब मुस्लमान दुनिया के लिए मिसाल हुआ करते थे लेकिन आज इसके विपरीत स्थिति बनी हुई है। इसका कारण मुसलमानों द्वारा कुरानी तालीम को तर्क करना और दुनियावी रंग में ढलना है।

साल 2011 की जनगणना के अनुसार मुस्लिमों के बीच तलाक की दर 0.56 प्रतिशत है जबकि हिन्दुओं में यह दर 0.76 प्रतिशत थी। इसके बावजूद मुसलमानों के खिलाफ दुष्प्रचार निरंतर जारी है। बदक़िस्मती से मुसलमानों की न आवाज़ है, न उनके पास कोई राष्ट्रीय नेता और रहनुमा है।

यही कारण है कि सुनियोजित तरीके से किये जा रहे प्रोपगंडे का जवाब देने वाला कोई नहीं है। यदि कोई इसके लिए आगे आता भी है तो फिर उसको निशाना बनाया जाता है। मुस्लिम समाज औरतों के हकों का मजाक बनाता रहा है जिसका फायदा दूसरे लोग उठा रहे हैं।

आज पूरी दुनिया में औरत के हक़ और उसके अधिकारों की बात तो हो रही है लेकिन क्या उसको यह सब हासिल हैं? वैसे किसी महिला को जो अधिकार इस्लाम ने प्रदान किये हैं वह किसी और मजहब में नहीं हैं।

औरत अपने परिवार के लिए सब कुछ होती है और वो घर में एक अच्छा माहौल बनाने की ताकत रखती है बशर्ते कि हमारी जिंदगी में इस्लामी शिक्षा जरूरी है। औरत के हकों की हिफाज़त जरुरी है तभी एक सभ्य मुआशरा बन सकता है।

(लेखक जमशीद आदिल अलैग)

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