बढ़ी हुई फीस वापस लेने की मांग को लेकर टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज के छात्र हड़ताल पर

बढ़ी हुई फीस वापस लेने की मांग को लेकर टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज के छात्र हड़ताल पर
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टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज के मुम्बई, हैदराबाद, गुवाहाटी और तुलजापुर कैंपस में पिछले कई दिनों से हड़ताल चल रही है। यहां के छात्र पढ़ाई का विरोध कर कक्षा बंद कर कैंपस में धरने पर बैठे हुए हैं। इसकी वजह केंद्र सरकार का एक फैसला है, जिसे ये लोग वापस लेने के लिए कह रहे हैं। टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज के छात्रों का कहना है कि केंद्र सरकार की ओर से पोस्ट मैट्रिक स्कॉलरशिप में कमी कर दी गई है।

इसकी वजह से टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज में भी फीस की छूट खत्म कर दी गई है। फीस बढ़ने की वजह से कई ऐसे भी छात्र हैं, जो फीस नहीं भर पा रहे हैं और नतीजा ये है कि उन्हें पढ़ाई बीच में ही छोड़नी पड़ रही है। टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज को 1936 में सर डोराबजी टाटा ग्रैजुएट स्कूल ऑफ सोशल वर्क के नाम से बनाया गया था। टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज का नाम इसे 1944 में मिला था और 1964 में इसे यूनिवर्सिटी ग्रांट कमीशन की ओर से डीम्ड यूनिवर्सिटी का दर्जा दे दिया गया।

इन चारों जगहों पर दलित और आदिवासी छात्रों के साथ ही अल्पसंख्यक छात्रों की भी अच्छी-खासी संख्या है। यहां पर पिछले कई सालों से अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़े वर्ग के उन छात्रों को फीस में छूट मिलती थी, जो पोस्ट मैट्रिक स्कॉलरशिप के लिए योग्य होते थे। ऐसे छात्रों को ट्यूशन फीस में छूट मिलती थी, वहीं इनसे मेस और हॉस्टल के पैसे नहीं लिए जाते थे।

लेकिन 2014 में केंद्र में सरकार बदलते ही फैसला हुआ कि अब स्कॉलरशिप सीधे छात्रो के खाते में जाएगी। इसमें इंस्टीट्यूट का रोल सिर्फ इतना सा था कि इंस्टीट्यूट को इस बात का सर्टिफिकेट देना पड़ता था कि वो छात्र स्कॉलरशिप के लिए योग्य है और इसके बाद से स्कॉलरशिप छात्रों के खाते में आने लगी।

लेकिन इसका नतीजा छात्रों के लिए उल्टा हुआ। टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज ने 2014 में अन्य पिछड़ा वर्ग के लिए ट्यूशन फीस में दी गई छूट को खत्म कर दिया। हालांकि मेस और हॉस्टल की छूट बरकरार रही, तब भी छात्रों ने कोई विरोध नहीं किया। 2015 में टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज की ओर से फीस बढ़ा दी गई। फीस की बढ़ोतरी करीब 45 फीसदी तक थी। छात्र बढ़ी हुई फीस को वापस लेने की मांग करते रहे, लेकिन प्रशासन की ओर से उनकी मांगों पर ध्यान नहीं दिया गया।

जब 2016 का सत्र शुरू हो रहा था, तो यूनिवर्सिटी की ओर से प्रॉस्पेक्टस में लिखा गया था कि बढ़ी हुई फीस वापस कर दी जाएगी लेकिन नहीं हुई। जब 2016 के छात्र 2017 में आए तो एक बार फिर से फैसला बदल गया। प्रशासन की ओर से एससी और एसटी के छात्रों से भी कहा गया कि उन्हें मेस और हॉस्टल का बिल चुकाना पड़ेगा। छात्रों ने इसका विरोध किया, लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ।

टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज के छात्रों और वहां के स्टूडेंट यूनियन ने इसके लिए यूनिवर्सिटी के अलावा मानव संसाधन मंत्रालय और सामाजिक न्याय मंत्रालय में भी याचिकाएं डाल रखी हैं। जब मंत्रालय में भी सुनवाई नहीं हुई, तो छात्रों का धैर्य जवाब दे गया और उन्होंने 21 फरवरी से हड़ताल की घोषणा कर दी। वहीं यूनिवर्सिटी के शिक्षक संगठन ने भी छात्रों की मांगों को जायज ठहराते हुए उन्हें समर्थन दे दिया है। हड़ताल कर रहे छात्रों का दावा है कि पूरे देश की यूनिवर्सिटी से उन्हें समर्थन मिल रहा है।

इन छात्रों का कहना है कि जब तक 2016-18 बैच और 2017-19 बैच के एससी, एसटी और ओबीसी के साथ ही अल्पसंख्यक छात्रों की बढ़ी हुई फीस वापस नहीं ली जाती, मेस और हॉस्टल की फीस माफ नहीं की जाती तब तक ये हड़ताल जारी रहेगी। अब ये छात्र पिछले तीन दिनों से हड़ताल पर हैं। उन्होंने टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज का गेट बंद कर दिया है और वो कैंपस में ही धरना दे रहे हैं।

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