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RSS और भीम सेना दोनों संस्थाओं का रजिस्ट्रेशन नहीं हुआ है, बैन लगाना है तो दोनों पर लगाओ!

कुछ दिन पहले सहारनपुर एक टीम के साथ गया था, गांवों में घरों और अस्पताल में घायलों से मिलने के बाद हम कलेक्टर और एसपी से मिले। इत्तेफाक से सहारनपुर में वही एसपी और कलेक्टर पदस्थ हैं जो मुज़फ्फरनगर दंगे में दंगा प्रभावित क्षेत्र में थे। कलेक्टर ने स्वीकार किया कि सहारनपुर में भीमसेना के प्रदर्शन के दौरान जब तोड़फोड़ हुई तो चन्द्रशेखर वहां मौजूद नहीं थे बल्कि कलेक्टर ने भीड़ को समझाने में मदद के लिये चन्द्रशेखर को फोन करके बुलाया था।

कलेक्टर के कहने पर भीमसेना के संस्थापक चन्द्रशेखर मोटर साइकिल पर वहां आये आकर उन्होंने लोगों का गुस्सा शांत किया और चले गये। इसके बाद हम पुलिस अधीक्षक से मिले। वह दूसरी ही कहानियां रच कर बैठे थे। एसपी ने कहा भीड़ हथियारों से लैस थी। हमारी एक महिला साथी ने पूछा कि क्या आपने कोई हथियार ज़ब्त किया, तो पुलिस अधीक्षक ने जवाब नहीं दिया बल्कि दूसरी ही कहानी छेड़ दी।

एसपी कह रहे थे कि मैं चन्द्रशेखर को नहीं छोडूंगा, हम पर गोली चलाने के लिये भड़काने वाले को हम कैसे छोड़ सकते हैं, हांलाकि किसी को ना तो कोई गोली लगी है, ना कोई हथियार बरामद हुआ है, ना कोई फोटो या वीडियो में गोली चलने का कोई प्रमाण है। एसपी ने कहा भीमसेना अवैध है क्योंकि यह रजिस्टर्ड संस्था नहीं है।

मैने जवाब दिया कि भीमसेना गैर रजिस्टर्ड हो सकती है लेकिन अवैधानिक नहीं है,एसपी ने कहा आप यह क्या कह रहे हैं ? मैनें कहा कि जैसे राष्ट्रीय सेवक संघ और पीयूसीएल गैर रजिस्टर्ड संगठन हैं पर अवैध नहीं हैं, यह सुनकर एसपी साहब चुप हो गये। मैं मुख्यमंत्री योगी की हिंदु युवा वाहिनी का नाम लेना भूल गया।

एसपी साहब से मैनें कहा कि प्रशासन के कामों से आम लोगों में न्याय के प्रति विश्वास पैदा होना चाहिये लेकिन जैसे मुज़फ्फरनगर में फर्जी वीडियो फैला कर दंगे करवाने वाले भाजपा विधायक संगीत सोम के खिलाफ पुलिस ने आज तक कोई कार्यवाही नहीं करी तो उससे लोगों को लगता है कि प्रशासन पक्षपात कर रहा है,

एसपी साहब ने बात टाल दी। मुझे लगता है सहारनपुर में दलित समुदाय में अन्याय का गहरा भाव है। मेरी राय में प्रशासन ने दलितों के प्रति शुरू से ही उपेक्षा और असमानता का व्यवहार किया। जब दलित समुदाय अम्बेडकर जयंती पर बाबा साहब की मूर्ति अपनी व्यक्तिगत ज़मीन पर लगाना चाहता था तो प्रशासन ने राजपूतों की धमकी के कारण वह मूर्ति लगाने पर रोक लगा दी। वह दलितों की अपनी ज़मीन थी। मूर्ति दलितों ने अपने पैसों से खरीदी थी। प्रशासन को क्या अधिकार था कि उसने अम्बेडकर साहब की मूर्ति लगाने पर रोक लगाई ?

यदि राजपूत अम्बेडकर की मूर्ति लगाने पर दंगा करने की धमकी दे रहे थे तो प्रशासन को पुलिस की मौजूदगी में बाबा साहब की मूर्ति लगवानी चाहिये थी और धमकी देने वालों पर प्रतिबंध लगाने चाहिये थे। राजपूतों की धमकी के सामने भयभीत होकर प्रशासन ने राजपूतों को बहुत ताकतवर होने का अहसास कराया जिसके कारण उन्होंने बार बार दलितों पर हमले किये।

दलितों पर हमला रोकने और हमलावरों को हतोत्साहित करने की बजाय प्रशासन ने पूरा ध्यान भीमसेना के अध्यक्ष चन्द्रशेखर को गिरफ्तार करने पर लगा दिया। इसी का परिणाम है कि हमलावरों में कल फिर से दलितों पर हमला करने की हिम्मत आ गई। सहारनपुर में दलितों को डराकर भाजपा के पैरों में समर्पण कराने की योजना भी योगी सरकार की हो सकती है।

लेखक- हिमांशु कुमार 

 

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