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मायावती- अखिलेश गठबंधन से यूपी में नयी राजनीति की शुरुआत, मुस्लिम- दलित के आगे भगवा राजनीति होगा फेल!

लोकसभा के लिए हुए उपचुनाव परिणाम की पूर्व संध्या पर संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (यूपीए) की अध्यक्ष सोनिया गांधी ने दिल्ली में रात्रिभोज का आयोजन किया जिसमें उत्तर प्रदेश से दो मजबूत क्षेत्रीय पार्टीयों समाजवादी पार्टी (सपा) के रामगोपाल यादव बहुजन समाज पार्टी (बसपा) के सतीशचंद्र मिश्रा ने शिरकत की और भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के खिलाफ संयुक्त रूप से लड़ने का संकेत दिया।

लगभग तीन दशक तक भाजपा का गढ़ और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का निर्वाचन क्षेत्र गोरखपुर ढह गया है, जिसने उन्हें पांच बार लोकसभा के लिए सांसद चुना है। गोरखपुर और फूलपुर लोकसभा सीटें भाजपा लाखों मतों से जीती थी लेकिन उपचुनाव में उसे हार का सामना करना पड़ा।

बिहार के संसदीय उपचुनाव में भी भाजपा को मुंह की खानी पड़ी। इन नवीनतम चुनावों के फैसले महत्वपूर्ण हैं। गोरखपुर सीट पर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का लम्बे समय से कब्ज़ा था। फूलपुर सीट पर उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य पिछली बार भारी मतों से विजयी हुए थे।

सपा-बसपा गठबंधन ने 1993 में भी जीत को रोक दिया था। मायावती की पार्टी 1996 के विधानसभा चुनावी गठजोड़ से दूर रही थी। लेकिन अब जीतने वाला गणित उसके साथ है। राजनीतिक विश्लेषक प्रोफेसर बद्ररी नारायण ने इसे दो पार्टियों के बीच ‘ईमानदारी से सामाजिक गठबंधन’ की जीत के रूप में वर्णित किया।

फूलपुर भी बेहद महत्वपूर्ण लोकसभा सीट है जिस पर साल 2014 में भाजपा ने जीत हासिल की थी। इसका प्रतिनिधित्व जवाहरलाल नेहरू, उनकी बहन विजयलक्ष्मी पंडित और पूर्व प्रधानमंत्री वी पी सिंह ने किया था। यहां से राज्य के उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य 52.43 प्रतिशत मत (503564) लेकर कामयाब रहे थे।

इस जीत के साथ राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना ​​है कि यह गठबंधन अब उत्तर प्रदेश में एक वास्तविकता बन जाएगा, जहां भाजपा और उसके सहयोगियों ने 2014 में 80 सीटों में 73 सीटें जीती थी। इलाहाबाद विश्वविद्यालय के राजनीति विज्ञान के प्रोफेसर एच.के. शर्मा ने कहा कि यूपी के उपचुनावों की जीत ने इनको नई ताकत दे दी है।

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