हरियाणा और महाराष्ट्र में भाजपा की गाड़ी पर जनता ने ब्रेक लगा दिया- वेदप्रताप वैदिक

हरियाणा और महाराष्ट्र में भाजपा की गाड़ी पर जनता ने ब्रेक लगा दिया- वेदप्रताप वैदिक

मैंने कल लिखा था कि हरयाणा और महाराष्ट्र के चुनावों में यदि भाजपा को प्रचंड बहुमत याने क्रमशः 75 और 240 सीटें मिल गईं तो भाजपा सरकारें ऐसी हो जाएंगी, जैसे बिना ब्रेक की गाड़ी हो जाती है लेकिन दोनों प्रदेशों की जनता को अब भाजपा की ओर से धन्यवाद दिया जाना चाहिए कि उसने भाजपा की गाड़ी पर ब्रेक लगा दिया है।

दोनों प्रदेशों में भाजपा ने सीटें खोई हैं। हरयाणा में तो उसे साधारण बहुमत भी नहीं मिला है और इस बार शिव सेना के साथ गठबंधन करने के बावजूद उसकी सीटें काफी घट गई हैं।

यह ठीक है कि महाराष्ट्र में सरकार बनाने लायक सीटें भाजपा गठबंधन को मिल गई हैं। हरयाणा में भी जोड़-तोड़ करके सरकार बनाना उसके लिए ज्यादा कठिन नहीं होगा।

गोवा, कर्नाटक और अरुणाचल के उदाहरण हमारे सामने हैं लेकिन ऐसी सरकारें कितनी जन-सेवा कर पाएंगी, इसका अंदाजा हम लगा सकते हैं। उनके सिर पर अस्थिरता की तलवार बराबर लटकती रहती है।

महाराष्ट्र में शिव सेना को भाजपा के मुकाबले बेहतर सफलता मिली है। उसकी कीमत वह जरुर वसूलेगी। वह तो अपना मुख्यमंत्री बनाना चाहती थी लेकिन शायद वह उप-मुख्यमंत्री का पद लेकर चुप हो जाए लेकिन यह निश्चित है कि उनमें तनाव सदा बना रहेगा।

इसी आपसी कहा-सुनी का दुष्परिणाम इन दोनों पार्टियों को महाराष्ट्र की जनता ने भुगता दिया है। दोनों प्रदेशों की जनता से ‘एक्जिट पोल’ वालों ने जो उम्मीदें रखी थीं, वे बिल्कुल गलत साबित हुई हैं और यह बात भी गलत साबित हुई है कि हमारी जनता भाजपा को सिर पर बिठाने के लिए मजबूर है।

दोनों प्रदेशों की जनता ने दिखा दिया है कि वह मजबूर नहीं है। उसने भाजपा के कान उमेठ दिए हैं। उस पर भाजपा और कांग्रेस के केंद्रीय नेतृत्व का असर बिल्कुल भी नहीं दिखा। अगर वह दिखता तो कांग्रेस का सूंपड़ा साफ हो जाता और दोनों प्रदेशों में भाजपा को अपूर्व बहुमत मिल जाता।

मोदी ने चुनाव के एक दिन पहले पाकिस्तान के खिलाफ सर्जिकल स्ट्राइक (फर्जीकल) का दांव मारा लेकिन वह बेकार हो गया और राहुल गांधी का जो हाल पहले था, वह अब भी जारी रहा। दूसरे शब्दों में महाराष्ट्र और हरयाणा के चुनाव प्रादेशिक नेतृत्व और प्रादेशिक मुद्दों पर ही हुए हैं। हरयाणा में जातिवाद की दस्तक भी जोरदार रही।

अब दिल्ली प्रदेश के चुनाव सिर पर हैं। पता नहीं, भाजपा और कांग्रेस का यहां हश्र कैसा होगा। केंद्र सरकार के लिए अब कठिनाई का दौर शुरु हो गया है। आशा है, अब वह कुछ सबक लेगी।

लेखक- डॉ वेदप्रताप वैदिक

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