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VIDEO-जब बाबरी मस्जिद गिरने पर आडवाणी ने पत्रकार से कहा- ऐतिहासिक दिन है, कुछ मीठा खाओ

6 दिसंबर 1992 का दिन पत्रकार रुचिरा गुप्ता के लिए कभी न भुलाई जा सकने वाली एक खौफनाक याद की तरह है. बाबरी मस्जिद गिराए जाने के २५ साल पूरे होने के मौके पर अपनी यादें साझा करने के लिए प्रेस क्लब में जुटे पत्रकारों में रुचिरा गुप्ता भी थीं जिन्होंने उस ढांचे को अपनी आँखों के आगे गिराए जाते देखा था. उस समय रुचिरा बिज़नेस इंडिया के लिए विशेष संवाददाता के तौर पर काम कर रही थीं और खास तौर पर उन दिनों वो उत्तर प्रदेश में बीजेपी नेता लाल कृष्ण आडवाणी की रथयात्रा को कवर कर रही थीं .

 

रुचिरा गुप्ता ने बताया उन दिनों आडवाणी अपनी हर  रैली के अंत में लोगों से शपथ लेने के लिए एक नारा लगवाते थे- कसम राम की खाते हैं, मंदिर वहीँ बनाएंगे.

रुचिरा गुप्ता ने उस दिन की घटना को याद करते हुए बताया कि आडवाणी के अलावा मुरली मनोहर जोशी, उमा भारती, विजय राजे सिंधिया, अशोक सिंघल, साध्वी ऋतंबरा समेत बीजेपी. विश्व हिन्दू परिषद्, बजरंग दाल के  तमाम नेता वहाँ अयोध्या में मौजूद थे और कारसेवकों की उग्र भीड़ को और भड़का रहे थे. नारे लग रहे थे- एक धक्का और दो, बाबरी मस्जिद तोड़ दो. उमा भारती और साध्वी ऋतंबरा लोगों की मर्दानगी को उकसाने वाले अंदाज़ में कह रही थीं- क्या चूड़ियां पहन रखी हैं . बहुत ही ज़हरीला माहौल था. एक गुम्बद पर जब कुछ लड़के चढ़ गए थे तो आडवाणी ने प्रमोद महाजन को एक एलान करवाने को कहा कि ये लोग नीचे उतर आएं ताकि मस्जिद ढहाने के दौरान कहीं इन्हे चोट न लग जाये.

सब कुछ सोचा समझा और तय किया हुआ था. आडवाणी वहां लीडर थे और वो ही तय कर रहे थे कि कौन  कब बोलेगा , क्या बोलेगा.

12 बजे पहला गुम्बद गिरा दिया गया .

रुचिरा ने बताया, ” मुझे मेरे पुराने संपादक एम जे अकबर की सीख याद थी कि एक अच्छे रिपोर्टर को घटनास्थल पर खुद जाकर देखना चाहिए और दूसरे स्रोतों पर निर्भर नहीं रहना चाहिए . इसलिए मैंने तय किया की मस्जिद के भीतर दूसरे गुम्बद की तरफ जाकर देखूं. दोपहर का वक्त था, बहुत गर्मी थीं , मैंने एक गीला रूमाल लपेटा हुआ था. मस्जिद में लोग ठसाठस भरे हुए थे – भगवा पट्टियां सिर पर और कमर में बांधे हुए. सब बहुत जोश में थे और बहुत उग्र थे और ज़ोर ज़ोर से चिल्ला रहे थे. कुछ लोगों के पास कुछ औज़ार भी थे . मैंने नज़दीक से जाकर जायज़ा लेने, बातें जानने  की कोशिश की.”

“तभी भीड़ में से कोई चिल्लाया – मुसलमान.”

“बस, तुरंत ही मेरा गला घोंटने के लिए हाथ आगे बढ़ने लगे, मैं मौत से सिर्फ चंद लम्हे दूर थी. मैंने कहना चाहा  मैं मुसलमान नहीं हूँ, मैं हिन्दू हूँ, मेरा नाम रुचिरा गुप्ता है पर मैं कुछ भी नहीं बोल सकी उस वक्त. उनके हाथ मेरा गला घोटने की कोशिश कर रहे थे और साथ ही उनके हाथ मेरे शरीर के अलग अलग अंगों को भी छूने की कोशिश कर रहे थे . वे मेरा सीना कोंच रहे थे, कमर नोच रहे थे, मुझ पर जानलेवा हमला करने के साथ साथ यौन शोषण भी चल रहा था. किसी ने कहा यहाँ नहीं मारते , ये तो गर्भ गृह है, बाहर ले जाते हैं ”

मुझे खींच कर ले ही जा रहे थे कि तभी एक शख्स जिसका मैंने एक दिन पहले इंटरव्यू किया था , उसने कहा ये मुसलमान नहीं हिन्दू है . मुझे बचाने के चक्कर में उसके हाथ पैर भी फूट गए लेकिन उसने मुझसे पूछा आप कहाँ जाना चाहती है- मैंने कहा ऊपर, छत की तरफ जहाँ लाल कृष्ण आडवाणी थे . मैंने सोचा वही सबसे सुरक्षित जगह है.

आडवाणी छत पर खड़े हुए थे और अपनी दूरबीन से कुछ देख रहे थे. मैं आडवाणी के पास गयी अपनी उसी बदहवास हालत में, और मैंने कहा- आपको पता है- वो महिलाओं और पत्रकारों पर हमला कर रहे हैं , आपको माइक पर  एलान करवाना चाहिए ताकि पत्रकारों और महिलाओं पर ये हमले बंद हों. ”

उस लम्हे, आडवाणी ने रुचिरा से कहा,” अपने साथ जो हुआ उसे भूल जाओ, इतना ऐतिहासिक दिन है, मीठा खाओ.”

“उनके सुरक्षाकर्मी ने मुझे कुछ मीठा देने की कोशिश की. मैंने कहा नहीं मुझे नहीं चाहिए आपकी मिठाई, आप पहले इसको रोकिये. तो उन्होंने अपनी दूरबीन मुझे पकड़ाई और कहा देखो मुसलमान खुद अपने घर जला रहे हैं मुआवज़े के लिए.”

रुचिरा गुप्ता ने बताया कि आडवाणी वहां से गायब हो गए और थोड़ी देर बाद लौटे माइक पर ये एलान करने के लिए कि सी आर पी एफ की टुकड़ियां वहां पहुँचने वाली हैं, मानव श्रंखला बना कर उनको आगे बढ़ने से रोकने के लिए तैयार रहें जब तक काम ख़तम नहीं होता है.

उस दौर को याद करते हुए रुचिरा कहती हैं , “बाद में मुझे काफी तरह की प्रताड़ना झेलनी पड़ी क्योंकि मैंने इस मामले में खुल कर बोलने का फैसला कर लिया था. मुझे डराया धमकाया गया , चरित्र पर कीचड उछाला गया. कहा गया- ये तो कई मर्दों के साथ रहती है.”

प्रेस क्लब में द वायर की तरफ से आयोजित इस कार्यक्रम में बाबरी मस्जिद ढहाए जाने से जुडी यादें साझा करने वालों में वरिष्ठ पत्रकार सईद नक़वी, बीबीसी के पूर्व पत्रकार मार्क टुली, इंडियन एक्सप्रेस की सीमा चिश्ती, मोनोबिना, फोटो जर्नलिस्ट प्रवीण जैन, रुचिरा गुप्ता और वृंदा गोपीनाथ शामिल थे.  इन पत्रकारों ने उस दिन की घटनाओं का ज़िक्र करते हुए कहा कि सब कुछ पूर्व नियोजित था, स्वतस्फूर्त नहीं जैसा कि बीजेपी के नेताओं ने बाद में अपने बचाव में दलील दी थी. घटना स्थल पर उस दिन मौजूद इन पत्रकारों के मुताबिक ढांचा  गिराए जाने से एक दिन पहले बाकायदा उसकी रिहर्सल की गयी थी

रुचिरा गुप्ता का कहना है कि बाबरी मस्जिद गिराए जाने के पचीस सालों में हालात बाद से बदतर ही हुए हैं. आज के दौर में भी केरल की 24  साल की हादिया को अपनी मर्ज़ी से शादी करने, अपना धर्म चुनने का फैसला करने की इजाज़त नहीं है.  कुछ लोगों को दंड से मुक्त रखने की कीमत हम अब तक चुका रहे हैं. इसका हल तभी हो सकता है जब बाबरी मस्जिद मामले में दोषियों को माफ़ी या छूट न मिले.

 

साभार- इंडिया संवाद

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