Wednesday , July 18 2018

आसनसोल : इमाम इमदादुल रशीदी की इमोशनल डायरी- ‘मुन्ना’ तू कहां चला गया?

हैदराबाद: इमाम इमदादुल रशीदी जिन्होंने जिन्होंने आसनसोल दंगे में अपने बेटे को खो दिया, ने अपनी डायरी में अपनी बात लिखी है. जिसको एक उर्दू अखबार ने प्रकाशित किया है। इमाम के छोटे बेटे सिब्तल्ला रशीदी उस हिंसा में मारे गए और उनका शव बाद में मिला था। उसका निधन होकर तीन दिन बीत चुके हैं, लेकिन ऐसा लगता है कि वह कहीं आसपास है।

ऐसा लगता है जैसे मुन्ना आये और चुपचाप मेज पर गिलास का पानी रखे, कमरे में एक नज़र डालें और गंदगी को साफ करने के बाद कमरे से बाहर निकल जायेगा। हमारे घर में सिर्फ दो कमरे हैं; एक इमाम का घर इस से बड़ा नहीं हो सकता। इसलिए हम कहाँ जायेंगे? हम केवल एक कमरे से दूसरे स्थान पर जायेंगे, जहां मुन्ना की मां खाना पकायेगी या सिलाई में व्यस्त होगी।

मुन्ना अपने काम में अपनी मां की मदद करेंगे, रसोई की व्यवस्था करेंगे, आसपास के वातावरण को स्वच्छ करेंगे और फिर अपनी मां से पूछेंगे, ‘क्या आप को मेरी ज़रूरत है?’ अगर माँ ‘नहीं’ कहती, तो वह चुपचाप घर से निकल जाएंगे। समय पर घर का काम करना और नमाज के लिए मेरे साथ मस्जिद जाना उसकी दिनचर्या का हिस्सा था। शायद ही ऐसा हुआ हो कि वह मेरे साथ मस्जिद नहीं गए हों।

स्थानीय नमाजी जब उसको मेरे साथ नहीं देखते तो वे मुझे रोक कर पूछते कि क्या आपका बेटा ठीक है? कभी-कभी मैं उन्हें बताता कि वह अपनी दादी के घर गए हैं। कभी-कभी मैं कहता कि वह कोचिंग के लिए स्कूल में हैं। तब उसे मगरिब या ईशा की नमाज में देखते तो उनको राहत महसूस होती।

वह लगभग 16 साल का था लेकिन मुन्ना ने कभी ऊँची आवाज में कभी बात नहीं की। वह इतना आज्ञाकारी था कि मेरे रिश्तेदार मेरी किस्मत पर ईर्ष्या करते थे। वे कहते आपका बेटा वास्तव् में सोना है। यह सुनकर मैं मुन्ना के लंबे जीवन के लिए प्रार्थना करता। मुझे नहीं पता था कि वह हमें जल्द ही छोड़ कर चला जायेगा।

मुझे लगता है कि उसको बुलाऊँ और कहूं कि देख तुम्हारी माँ को क्या हो गया है। रसोई गन्दा दिखता है? और बोलूं कि मुझे नहीं पता है कि मेरा रुमाल, टोपी और बटुआ कहाँ हैं? कोई भी इन दिनों मेरी मेज की व्यवस्था नहीं कर रहा है, क्या मुझे अकेले मस्जिद जाना है?

TOPPOPULARRECENT