‘हम विकास के उस स्थान पर पहुंच चुके हैं जहां हैवानियत ने इंसानियत पर जीत दर्ज करली है’

‘हम विकास के उस स्थान पर पहुंच चुके हैं जहां हैवानियत ने इंसानियत पर जीत दर्ज करली है’

हम सब विकास के उस स्थान पर पहुंच चुके हैं जहां हैवानियत ने इंसानियत पर जीत दर्ज करली है। अब ऐसा लगने लगा है कि शैतानियत का झंडा बुलंद होता चला जाएगा। कल रात भर नींद से ऑंखें बहुत दूर रहीं। नींद इस लिए नहीं आ रही थी क्योंकि ज़हन में उस मासूम बच्ची का चेहरा बार बार दस्तक दे रहा था, जो इंसाननुमा शैतानों की दरिंदगी का शिकार हो गई थी।

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यह बच्ची जम्मू के कठुआ जिला के एक छोटे से गाँव की रहने वाली थी। उसके भूरे बाल, बड़ी बड़ी आँखों वाला मासूम चेहरा मुझ से बार बार सवाल कर रहा था कि मेरे बाप, भाई चाचा की उम्र के लोगों ने मेरे साथ एसी दरिंदगी क्यों की? आप तो निर्भया को इंसाफ दिलाने के मामले में खूब आवाज़ उठती रही थीं, मेरे लिए आप क्यों चुप हैं? क्यों यह समाज इंसाफ के नाम पर गुटों में बंट जाता है? क्यों ऐसे घिनौने अपराध पर भी राजनीति होती है और वह भी साम्प्रदायिक राजनीति?

यह उस बच्ची के सवाल मुझ से थे या पूरे भारतीय समाज से? या फिर यह सवाल खुद मेरे जहन में संवेदनशीलता की वजह से अपने आप पैदा हो रहे थे? उससे अलग अगर यह सवाल हमारे जहन में नहीं आ रहे हैं तो मुझे यह कहने में कोई एतराज़ नहीं है कि हमें खुद को समृद्ध समाज कहने का कोई अधिकार प्राप्त नहीं है।

हम कहां आ चुके हैं? क्या जो अपराध भीड का हिस्सा थे और जिन पर भीड़ पर्दा डाल देती थी अब वह अपराध जन के साथ जुड़ गए हैं? क्या यह समाज तबाही के उस दहाने पर पहुंच चूका है, जहाँ से उसकी वापसी मुमकिन नहीं है? क्या अब अपराधियों की करतूतों पर पर्दा डालने के लिए क्या ज़ात पात और मजहब का सहारा काफी है? अगर अपराध करने वाला मेरी जाति का है, मेरे मजहब का है तो उसका अपराध मेरे लिए कोई मायनी नहीं रखता, अब उसे सम्मान मिलेगा, लेकिन अगर अपराधी किसी और जाति यह धर्म का और क्षेत्र का है तो मेरी नफरत, मेरी चीख और मेरा शोर कुछ और ही होगा।

क्या यह इंसाफ का तकाज़ा है? क्या यही हमारे धर्म और हमारे बुजुर्गों ने हमें सिखाया है? क्या ऐसा करके हम उन पवित्र नामों के खिलाफ खड़े नजर नहीं आते हैं, जो हमारे मजहब की रौशनी हैं। जिनके नाम से हमारे भी नाम होते हैं। कुछ तो हमारे समाज में गलत खून शामिल हो गया लगता है, जिसकी वह से हमारी इंसाफ से सोचने समझने की गुणवत्ता डगमगा चुकी है।
(डॉ सैयद मुबीन जोहरा)

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