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श्रीलंका : कट्टरपंथी समूह बेखौफ कर रहे हैं हिंसा

श्रीलंका के कैंडी ज़िले में सिंहली बौद्ध और अल्पसंख्यक मुसलमान समुदाय के बीच हिंसक झड़पों और मस्जिदों पर हमले के बाद यहां दस दिनों के आपातकाल की घोषणा की गई थी। अशांति को काबू करने में नाकाम रहने के बाद विपक्षी दलों ने राष्ट्रपति मैत्रीपाला सिरीसेना और प्रधानमंत्री रानिल विक्रमसिंहे की निंदा की है। सेन्ट्रल श्रीलंका के कैंडी में हुई हिंसा और पूर्वी तट पर अम्पारा में मुसलमानों को पीटा गया।

श्रीलंका में 2011 में आपातकाल हटाया गया था जिसके बाद पहली बार फिर से आपातकाल लागू किया गया है। 1971 से कुछ संक्षिप्त अंतराल को छोड़कर क़रीब चार दशकों तक श्रीलंका में आपातकाल लागू था। 1983 के बाद से आपातकाल विद्रोही तमिल समूह लिबरेशन टाइगर्स ऑफ़ तमिल ईलम (एलटीटीई), जिसे तमिल टाइगर्स के नाम से भी जाना जाता है, के अलग राज्य की मांग के कारण उपजे गृहयुद्ध के कारण लगाया गया था।

मुसलमानों के खिलाफ नफरत उगलने वाला तीसरा सबसे बड़ा समुदाय श्रीलंका की 21.2 मिलियन आबादी का लगभग 10 प्रतिशत हिस्सा है। सात मार्च को एक बार फिर से इलाके में कर्फ़्यू लगा दिया और हालात पर काबू पाने के लिए कुछ सोशल मीडिया वेबसाइट्स और फ़ोन मैसेजिंग सेवाएं भी प्रतिबंधित की गईं हैं। श्रीलंका की आबादी दो करोड़ दस लाख के क़रीब है, जिसमें तीन चौथाई सिंहली बौद्ध हैं जबकि देश की आबादी में 10 फ़ीसदी मुसलमान हैं।

भारत, जो पहले से ही श्रीलंका में चीन के बढ़ते प्रभाव से चिंतित हैं, क्षेत्रीय सुरक्षा के असर से किसी भी तरह के संघर्ष से चिंतित होंगे। श्रीलंका को जातीय और सांप्रदायिक संघर्ष के दीर्घकालिक परिणामों के बारे में अच्छी तरह से अवगत होना चाहिए। सरकार को नवीनतम हिंसा के अपराधियों पर कार्रवाई करने और द्वीप के अल्पसंख्यकों की रक्षा के लिए प्रतिबद्ध होना चाहिए।

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