क्यों सऊदी अरब ईरान से अपनी लड़ाई में कुर्बान कर रहा है फलस्‍तीनीयों?

क्यों सऊदी अरब ईरान से अपनी लड़ाई में कुर्बान कर रहा है फलस्‍तीनीयों?

1948 में इस्राएल के बनने के बाद यह पहला मौका है जब सऊदी अरब के किसी अधिकारी ने इस्राएल का खुलकर समर्थन किया है। अमेरिकी पत्रिका द अटलांटिक दो दिए इंटरव्यू में सऊदी अरब के राजकुमार मोहम्मद बिन सलमान ने कहा कि इस्राएल को अपने अस्तित्व का हक है।

राजकुमार सलमान ने यह भी कहा कि सऊदी अरब को यहूदियों से कोई समस्या नहीं है और खुद पैगंबर मोहम्मद ने “एक यहूदी महिला से शादी” की थी।

राजकुमार सलमान का यह बयान भी दोनों देशों की बढ़ती नजदीकी की तरफ इशारा करता है, “इस्राएल अपने आकार की तुलना में एक बड़ी अर्थव्यवस्था है, वह एक बढ़ती अर्थव्यवस्था है और निश्चित रूप से ऐसे कई इलाके हैं जहां हम इस्राएल के हित साझा करते है, और अगर शांति रहती है तो इस्राएल और खाड़ी कोऑपरेशन काउंसिल के देशों व मिस्र और जॉर्डन के साथ कई हित साझा होंगे।”

सऊदी अरब और इस्राएल ईरान के बढ़ते प्रभाव को रोकना चाहते हैं। सुन्नी बहुल सऊदी अरब नहीं चाहता कि खाड़ी और अरब देशों में शिया बहुल ईरान का प्रभाव फैले। ईरान सीरिया, यमन और दूसरे देशों में जारी विवादों में भी शामिल है।

मिस्र की काहिरा यूनिवर्सिटी में पॉलिटिकल साइंस के प्रोफेसर हसन नफा कहते हैं कि ईरान सऊदी अरब और इस्राएल को करीब ला रहा है, “सऊदी अरब को लगता है कि मुस्लिम जगत का नेतृत्व करने में ईरान उसका प्रतिद्ंवद्वी है, डर है कि कहीं शिया बहुल ईरान प्रभुत्व स्थापित न कर ले।”

दोनों देशों को यह भी चिंता है कि ईरान कहीं परमाणु हथियार न बना ले। नफा के मुताबिक अगर इस्राएल ईरान के परमाणु ठिकानों पर हमले भी करे तो सऊदी अरब को इससे सकून मिलेगा।

Top Stories