Monday , July 16 2018

क्यों अल्पसंख्यक छात्रों के बीच में ही स्कूल छोड़ने की दर बढ़ रही है?

राष्ट्रीय उत्पादकता परिषद की एक रिपोर्ट के मुताबिक अल्पसंख्यक समुदायों के बच्चों द्वारा बीच में ही स्कूल छोड़ने के कारणों में शौचालय, कक्षायें, विद्यालयों का उचित दूरी के भीतर, शिक्षकों की अनुपस्थिति माता-पिता की गरीबी शीर्ष कारण हैं जिसकी वजह स्कूल छोड़ने की दर बढ़ रही है।

रिपोर्ट में बताया गया है कि आठ राज्यों असम, बिहार, हरियाणा, झारखंड, महाराष्ट्र, राजस्थान, उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल में विशेष कारणों के कारण अल्पसंख्यक बच्चों की स्कूल छोड़ने की उच्च दर है।

अल्पसंख्यक मामलों के मंत्रालय ने एनपीसी को मुस्लिमों सहित सभी अल्पसंख्यक समुदायों, देश के अन्य समुदायों के अलावा शिक्षा के सभी स्तरों पर, उच्च छोड़ने वालों की दर के कारणों की जांच करने के लिए कहा था। अध्ययन की अंतरिम रिपोर्ट मंत्रालय को सौंप दी गई है जिसने सामाजिक न्याय की संसदीय स्थायी समिति को आगे भेज दी है।

रिपोर्ट के मुताबिक, आठ राज्यों में शौचालय, पर्याप्त दूरी पर प्राथमिक विद्यालयों की उचित सुविधाएं नहीं हैं। पर्याप्त कक्षाएं नहीं हैं जिनके कारण छात्रों को पेड़ों या अन्य स्थानों पर बैठकर पढ़ना पडता है। फर्नीचर, लड़कों और लड़कियों के लिए कोई अलग शौचालय, दीवार नहीं, खेल का मैदान, प्रशिक्षित शिक्षक लाइब्रेरी नहीं होना भी इसके अन्य कारण हैं।

रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि अल्पसंख्यक मामलों के मंत्रालय ने इन स्कूलों की दयनीय स्थिति पर जानकारी लेने के लिए अपने अधिकारियों की कोई टीम नहीं भेजी है और न ही कोई निगरानी कभी की गई है। निष्कर्षों का ध्यान रखते हुए, संसदीय पैनल ने मंत्रालय को अपनी उदासीनता के लिए खारिज कर दिया है।

समिति ने एनपीसी की रिपोर्ट के माध्यम से जाने के लिए मंत्रालय को सिफारिश की है और अपने अधिकारियों की एक टीम को उच्च छोड़ने वालों की दर के राज्यों में भेजने और रिपोर्ट में दिए गए सुझावों पर कार्रवाई करने की सिफारिश की है।

एनपीसी अध्ययन में दिए गए सुझावों पर समिति ने मंत्रालय द्वारा एक रिपोर्ट की गई कार्रवाई की भी मांग की है। इस अध्ययन में सभी अधिसूचित अल्पसंख्यक समुदायों जैसे कि मुसलमान, ईसाई, सिख, बौद्ध, पारसी और जैन शामिल हैं, जो कि भारत की आबादी का 19% से ज्यादा हिस्सा है।

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