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किसानों को राहत प्रदान करने में योगी सरकार फेल, उचित दाम नहीं मिल पाने पर किसानों ने सड़कों पर फेंके करोड़ों के आलू

फरुर्खाबाद : योगी सरकार भले ही किसानों को राहत प्रदान करने के लिए लाख दावे करे लेकिन इसका कोई फर्क नहीं पड़ रहा है। आज भी किसानों को अपनी फसल के वाजिब दाम नहीं मिल पा रहे हैं। जिसकी वजह से उन्हें सड़कों पर फेंकना पड़ रहा है। योगी सरकार की पहल पर हुई आलू की सरकारी खरीद भी किसानों को इस घाटे से नहीं उबार सकी। आलू व्यापारी अशोक कटियार ने बताया कि आलू की आवक बढ़ रही है। लागत के मुकाबले रेट कम हैं। वहीं आलू किसानों की माने तो यह सब ऐसी स्थितियां आ रही हैं जिससे कि आने वाले समय में उन्हें इस खेती से मोह छोड़ना पड़ेगा।

ताजा मामला फरुर्खाबाद का है। नोटबंदी के बाद से फ़र्रुखाबाद के आलू किसानों के न तो आलू बिक रहे हैं और न ही सीड। कोल्ड स्टोरेज से किसान अपना आलू नहीं उठा रहे हैं। जिस कारण कोल्ड मालिक कोल्ड में रखे आलू को अब बाहर फेंकने को मजबूर हैं ।फर्रुखाबाद में इस बार लगभग 200 करोड़ रूपये का आलू सड़कों पर फेंका जा रहा है। इतना ही नहीं लगातार घाटे के कारण आलू किसान आत्महत्या करने तक को मजबूर हो गया है। किसानों को बेटियों की शादियाँ स्थगित करनी पड़ रहीं हैं। कोई किसानों की सुनने वाला नहीं है।

यूपी में आलू के किसान बेहाल हैं। बंपर पैदावार ने किसानों की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। हालात ये है कि मंडियों में उन्हें आलू की लागत निकालना भी मुश्किल हो गया है। फर्रुखाबाद, आगरा, बाराबंकी और कानपुर ये कुछ ऐसे इलाके हैं जहां आलू की जोरदार खेती होती है और इस साल भी इन इलाकों में आलू की भारी पैदावार हुई है। कई इलाकों में तो किसानों को ढुलाई भी जेब से देनी पड़ रही है। 200 रुपये क्विंटल से भी नीचे के भाव पर किसान आलू बेच रहे हैं। इनकी शिकायत है कि चुनावी मौसम में सरकार की ओर से कोई पूछने भी नहीं आ रहा। फर्रूखाबाद में कुछ किसान कोल्ड स्टोरों का भी रुख करने लगे हैं। लेकिन कीमत को लेकर किसानों में काफी ज्यादा निराशा है।
आलू उत्पादन में उत्तरप्रदेश के फर्रुखाबाद जनपद का देश में विशिष्ट स्थान रहा है। यहां का आलू असम व बंगाल से लेकर मुंबई तक जाता है। जनपद में अधिकांश किसान आलू की फसल करते हैं या यूं कहें कि आलू बोना जनपद के किसानों के लिए मूंछ का सवाल होता है। लड़कों के रिश्ते परिवार में आलू की फसल के क्षेत्रफल के आधार पर तय होते हैं। यही कारण है कि जनपद की अर्थव्यवस्था मुख्य रूप से आलू की फसल पर आधारित है। इस बार बंपर पैदावार और अन्य प्रदेशों की मंडियों में मांग न होने के कारण आलू मंदी के दौर से गुजर रहा है। नोटबंदी की मार से पहले ही टूट चुके आलू किसान इस बार गंभीर संकट में हैं। इस बार मुनाफा तो दूर फसल से लागत निकल पाना भी मुश्किल हो रहा है।

ऐसा नहीं है कि किसानों ने सरकार से आलू खरीदने की अपील नहीं की। अपील करने के बाद भी उन्हें सरकार से कोई राहत नहीं मिली। सरकार की बेरुखी से परेशान किसानों ने अब इसे सड़कों पर फेंकना शुरू कर दिया है। फर्रुखाबाद के 70 कोल्ड स्टोरेज में 4 लाख मीट्रिक टन आलू पड़ा हुआ है। जिसे किसान वापस लेकर ही नहीं जा रहे हैं। वजह है दाम कम मिलने से होने वाला घाटा।

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