योगी आदित्यनाथ के खिलाफ़ चल रहे केस को योगी सरकार ने वापस लेने का फैसला किया

योगी आदित्यनाथ के खिलाफ़ चल रहे केस को योगी सरकार ने वापस लेने का फैसला किया
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लखनऊ। 22 साल पहले (1995) पीपीगंज थाने में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और केंद्रीय वित्त राज्यमंत्री शिवप्रताप शुक्ल सहित तमाम भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) नेताओं के खिलाफ दर्ज मुकदमा अब नहीं चलेगा। इस केस को सरकार ने वापस लेने का फैसला किया है।

इसकी मंजूरी राज्यपाल राम नाईक से भी मिल गई है। जल्द ही न्यायालय में प्रार्थना पत्र प्रस्तुत किया जाएगा। डीएम ने 27 अक्टूबर 2017 को पत्र लिखकर शासन को इस मुकदमे को वापस लेने का अनुरोध किया था।

इसी के अनुक्रम में राज्यपाल ने मुकदमा वापस लेने की संस्तुति दे दी। शासन के अनुसचिव अरुण कुमार राय ने 20 दिसंबर 2017 को शासन के निर्णय और आदेश की जानकारी डीएम को दे दी है। अब लोक अभियोजक, कोर्ट में शासन के निर्णय की जानकारी देते हुए मुकदमा वापस लेने की अर्जी देंगे।

पीपीगंज थाने में दर्ज इस मुकदमे को राजनीतिक बताया गया है। शासन की तरफ से कहा गया कि तत्कालीन सपा सरकार ने जानबूझकर मुकदमा दर्ज कराया था।

जब मुकदमा दर्ज हुआ था, तब योगी आदित्यनाथ गोरक्ष पीठ के उत्तराधिकारी थे। बाद में सांसद बने और अब यूपी के मुख्यमंत्री हैं। मुकदमे में ये नामजद सीएम योगी आदित्यनाथ, केंद्रीय वित्त राज्य मंत्री शिवप्रताप शुक्ल, भाजपा खेलकूद प्रकोष्ठ के राष्ट्रीय सह-संयोजक राकेश सिंह पहलवान, कुंवर नरेंद्र सिंह, समीर कुमार सिंह, विश्वकर्मा द्विवेदी, सहजनवां के वर्तमान विधायक शीतल पांडेय, विभ्राट चन्द कौशिक, भाजपा के वर्तमान क्षेत्रीय अध्यक्ष उपेंद्र दत्त शुक्ल, शम्भू शरण सिंह, भानुप्रताप सिंह, ज्ञान प्रताप शाही, रमापति त्रिपाठी सहित अन्य। ये था मामला 1995 में ब्लाक प्रमुख पद का चुनाव था।

मानीराम से तत्कालीन सपा विधायक ओम प्रकाश पासवान ने जंगल कौड़िया के विकास चौबे को उम्मीदवार बनाया। भाजपा की तरफ से रामपत यादव को उम्मीदवार बनाया गया।

इसका समर्थन गोरक्षपीठ के तत्कालीन उत्तराधिकारी योगी आदित्यनाथ ने भी किया। इसी मामले में विवाद हुआ। तब धारा 144 लागू थी। आरोप था कि धारा 144 का उल्लंघन हुआ।

रोक के बाद भी यात्रा निकाली गई। जनसभा करके वोट मांगे गए। इसी आधार पर धारा 188 के तहत पीपीगंज थाने में मुकदमा दर्ज किया गया था।

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